दुर्दम से भैरवेंद्र तक · लगभग 1200 से 1443 ई. · और उसके बाद जो हुआ। तेरह राजाओं की वंशावली, दो शिलालेखों का असली संस्कृत पाठ, और यह भी दर्ज है कि किसने क्या मिटाया।
दो जगहों पर स्थानीय परंपरा सही थी और 1847 का अंग्रेज़ का पाठ ग़लत — यह 1875 में कनिंघम ने, फिर 1901 में मिले दूसरे शिलालेख ने सिद्ध किया।
फिर भी आज तक ग़लत नाम ही दोहराया जाता रहा। यह किताब वही सुधार, पन्ना-दर-पन्ना, स्कैन के साथ रखती है।
दोनों शिलालेखों की सूचियाँ आमने-सामने। जहाँ किट्टो और 1901 का पत्थर अलग पढ़े गए, वहाँ किताब दोनों पाठ दिखाती है।
किसी एक ने पूरी कहानी नहीं देखी। किताब बताती है कि कौन कहाँ खड़ा है।
किताब यह भी साफ़ लिखती है कि कहाँ सबूत ख़त्म होता है। जो नहीं मिला, उसे अनुमान से नहीं भरा गया।
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