उमगा SSR · v1.0
28 मूल पन्ने
JASB XVI · 1847 · पृ. 1220◆ ASI XI · कनिंघम · 1875-76◆ JPASB II · दयाल · 1906◆ Indian Antiquary XX · 1891◆ Gazetteer: Gaya · 1906◆ Buchanan · 1810-12◆
JASB XVI · 1847 · पृ. 1220◆ ASI XI · कनिंघम · 1875-76◆ JPASB II · दयाल · 1906◆ Indian Antiquary XX · 1891◆ Gazetteer: Gaya · 1906◆ Buchanan · 1810-12◆
अभिलेखों पर आधारित जाँच

उमगा का
खोया हुआ राजवंश

दुर्दम से भैरवेंद्र तक · लगभग 1200 से 1443 ई. · और उसके बाद जो हुआ। तेरह राजाओं की वंशावली, दो शिलालेखों का असली संस्कृत पाठ, और यह भी दर्ज है कि किसने क्या मिटाया।

28
मूल पन्ने
13
राजा
59
पृष्ठ · PDF
1810–1906
स्रोत-काल
उमगा का खोया हुआ राजवंश — आवरण
हर दावे के साथ मूल पन्ना
जाँच का नतीजा

दो जगहों पर स्थानीय परंपरा सही थी और 1847 का अंग्रेज़ का पाठ ग़लत — यह 1875 में कनिंघम ने, फिर 1901 में मिले दूसरे शिलालेख ने सिद्ध किया।

फिर भी आज तक ग़लत नाम ही दोहराया जाता रहा। यह किताब वही सुधार, पन्ना-दर-पन्ना, स्कैन के साथ रखती है।

भाग 3 — तेरह राजा

दुर्दम से भैरवेंद्र तक

दोनों शिलालेखों की सूचियाँ आमने-सामने। जहाँ किट्टो और 1901 का पत्थर अलग पढ़े गए, वहाँ किताब दोनों पाठ दिखाती है।

01
दुर्दम
किट्टो ने "भूमिपाल" पढ़ा
02
कुमारपाल
03
लक्ष्मणपाल
सरगुजा, 1240 ई.
04
चंद्रपाल
05
नयनपाल
06
संधेश
शिवरात्रि मेला आज भी
07
अभयदेव
08
मल्लदेव
09
केशिराज
विष्णु-भक्त
10
नरसिंह देव
किट्टो: "बरसिंह"
11
भानुदेव
12
सोमेश्वर
शिव-भक्त
13
श्रीभैरवेंद्र
दोनों मंदिर, वंश का अंत
विषय-सूची

अंदर क्या है

01 किसने क्या कहा पृ. 5
02 पत्थर ख़ुद क्या कहता है पृ. 6
03 तेरह राजा पृ. 13
04 कुल, गोत्र, वंश और नाम पृ. 21
05 इनके भगवान पृ. 23
06 वंश कैसे समाप्त हुआ, और किसके कारण पृ. 25
07 क्या-क्या मिटाया गया, और किसने पृ. 33
08 आसपास के और भूले हुए राजवंश पृ. 38
09 रवानी नाम अभिलेखों में कहाँ मिलता है पृ. 45
10 कौन-कौन सी गलतियाँ हुईं पृ. 57
11 क्या छुपा हुआ है पृ. 57
पत्थर ख़ुद क्या कहता है

मूल संस्कृत, बिना सुधार

श्लोक 2
ऊमङ्गा नगरी गरीयसि गिरौ… सोमकुलोद्भव
उमगा नगरी ऊँचे पर्वत पर, और "सोम-कुल में उत्पन्न"।
JASB XVI · दिसंबर 1847 · पृ. 1224
श्लोक 3
रजनीनाथवंशे… राजन्यानाम्… दुर्दमो भूमिपालः
चंद्रमा के वंश में, राजन्यों में, दुर्दम भूमिपाल। यही नाम परंपरा भी कहती थी।
JASB XVI · दिसंबर 1847 · पृ. 1224
श्लोक 19
स्वकुलजलधिचंद्रो राजते भैरवेंद्रः
अपने कुल-सागर के चंद्रमा की तरह भैरवेंद्र शोभित हैं।
JASB XVI · दिसंबर 1847 · पृ. 1225
भाग 1 — किसने क्या कहा

नौ लोग, लगभग सौ साल, टुकड़ों में दर्ज

किसी एक ने पूरी कहानी नहीं देखी। किताब बताती है कि कौन कहाँ खड़ा है।

कैप्टन एम. किट्टो
1847
शिलालेख पहली बार छापा; संस्थापक का नाम "भूमिपाल" ग़लत पढ़ा; शिलालेखों के विनाश पर रोष जताया।
राजेंद्रलाल मित्र
1847
JASB में अंग्रेज़ी अनुवाद छपा — इसमें "the wise king Durdama" साफ़ लिखा है।
मि. पेप्पे
1866
उमगा-देव की तस्वीरें लीं (नं. 36-48); दर्ज किया कि यहाँ बौद्ध मूर्तियों की पूर्ण अनुपस्थिति है।
अलेक्ज़ेंडर कनिंघम
1875-76
गया के 31 शिलालेख सूचीबद्ध; उमगा वंश को "सोमवंशी राजा, संस्थापक दुर्दम" कहा — किट्टो की गलती तब ही सुधर चुकी थी।
परमेश्वर दयाल
1901-1906
5 नवंबर 1901 को दूसरा शिलालेख (सं. 1500) खोजा; दोनों सूचियों की तुलना छापी।
एल.एस.एस. ओ’मैली
1906
गजेटियर में: "150 साल उमगा में रहे, फिर देव गए"; भैरवेंद्र की विधवा से विवाह।
भाग 11

अब भी क्या नहीं मिला

किताब यह भी साफ़ लिखती है कि कहाँ सबूत ख़त्म होता है। जो नहीं मिला, उसे अनुमान से नहीं भरा गया।

1240 ई.
सरगुजा का शिलालेख
लक्ष्मणपाल का, "कुमार राजा का पुत्र"। किट्टो के पास पांडुलिपि में था; कहीं छपा नहीं मिला।
अज्ञात
विजेता का नाम
मुख्य द्वार के कूफ़ी शिलालेख में था; छेनी से काट दिया गया।
1876
तीसरा उमगा शिलालेख
कनिंघम ने देखा — ग्रेनाइट पर नागरी लेख, मौसम से इतना नष्ट कि तीन लगातार अक्षर नहीं पढ़े जा सके।
1906
संवत् 1500 वाली शिला
दयाल ने चेताया था कि वह ढीली पड़ी है और उठा ली जा सकती है। 120 साल से कोई सूचना नहीं।
1420 ई.
गया का संवत् 1476 का शिलालेख
27 पंक्तियाँ, 24 श्लोक। डेढ़ सौ साल से किसी ने अनुवाद नहीं किया।
1888
सरकारी रिपोर्ट
उमगा मंदिर पर पूर्ण तकनीकी रेखांकन सहित रिपोर्ट सरकार को भेजी गई। अनखोजी।
लॉन्च मूल्य

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SSR · संस्करण 1.0 · अगस्त 2026
इस पुस्तक के सभी अभिलेख-चित्र मूल प्रकाशित पन्नों के स्कैन हैं और सार्वजनिक डोमेन में हैं। मंदिर की फोटो: Abhishek Singh Chauhan, Wikimedia Commons, CC BY 4.0।
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